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जब जागो तब सवेरा
by सुनीता ठाकुर
प्रस्तुत लेख ये सन्देश देता है कि खुद महिलाओं को बेटी, बहू, सास, मां के खेमों से निकालकर एकजुट होना होगा। उन्हें मर्दों के इस समाज, मर्दों की राजनीति, मर्दों के धर्म में अपनी पहचान बुलंद करनी ही होगी।
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मैं हंसना चाहती हूँ
by अज्ञात
ये पूछे जाने पर कि वह क्यों पढ़ना चाहती हैं, पढ़िए विभिन्न औरतों ने क्या जवाब दिया।
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एकल औरत की इंसानी पहचान
by सम्पादन समूह
प्रस्तुत है महाराष्ट्र में चल रहे एकल औरतों के संघर्ष की झलक।
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थेरी गाथा
by जुही जैन
पढ़िए बौद्ध भिक्षुणियों के गीत- थेरी गाथा के बारे में। ये गीत पच्चीस सौ साल पहले रूढ़िवाद और संस्कारों की चार-दीवारी में रहने वाली औरतों द्वारा गाए गए थे। थेरी गाथा औरतों की लगन और जागरूकता का बखान है।
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समाज में नारी का दर्जा
by सीमा श्रीवास्तव
प्रस्तुत लेख विश्व युवक केंद्र, नई दिल्ली में अक्टूबर 1996 को आयोजित लिंग प्रशिक्षण कार्यशाला की रिपोर्ट पर आधारित है। इस कार्यशाला में कार्यकर्त्ताओं द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों से कुछ ख़ास मुद्दों पर चर्चा हुई जैसे समाज में मूल सत्ता किसके हाथ में है, समाज में औरतों की स्थिति, पहचान व समस्याएं आदि।
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बच्चे जंगली घास नहीं
कहानी
by सुभद्रा सक्सेना
इस लेख में गाँव की महिलाओं के बीच बातचीत के ज़रिये बच्चों के पालन-पोषण में सावधानी बरतने और उन्हें रोगमुक्त रखने के विषय में जानकारी दी गई है।
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