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सामाजिक असामनता के कारन स्त्रिया अधिक मरती हैं

by सुहास कुमार
" यह हमारी सामाजिक संस्कृति और परपराओं की देन हैं । लड़की को यही शिक्षा दी जाती हैं कि उसे ससुराल जाना हैं, घर के काम- काज में निपुर्ण होना हैं और उसे परिस्थितियों के साथ समझौता करना हैं । उसे सहने कि आदत होनी चाहिए । ... दूसरे शब्दों में उसे बताया जाता हैं कि उसे कर्मप्रधान और सहनशील ज़िन्दगी बितानी हैं । परिस्थितियों को बदलने की बजाए उनसे समझौता करना आना चाहिए । " आगे पढ़िए...
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हमारी बात

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" बहने चाहे तो सामाजिक रूढ़ियों को बदल सकती हैं । बुनियादी बात हैं कि लड़की को जन्म से सम्मान मिले । लड़कियों की उपेक्षा न हो, उन्हें लड़को के बराबर समझा जाए । उन्हें आगे बढ़ने के बराबर अवसर मिले, उनकी सामान देखभाल हो । माए यह न सोचे कि लड़की पराये घर का पौधा घर का पौधा हैं, उसे क्यों सोचे ? कमज़ोर पौधा मजभूत पेड़ नहीं बन सकता । यदि वह प्यार से सोचा जाए और उसे उचित पोषण मिले तब देखिए उसका मज़बूती । " आगे पढ़िए...
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उसका बदलना

by वासंती रामचंद्रन
"औरत भी ज़िंदा इंसान नहीं भोग की वह सामान " आगे पढ़िए...
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गर्भ के दौरान दवसियो से सावधान

by वीणा शिवपुरी
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इलाज के पारपरिक तरीके

by एन भी सरोजिनी
"आज भी बांदा जिले की आदिवासी औरतें माहवारी के दर्द के लिए एक खास ढंग से पेट की मालिश करती हैं । हथेली और पगतली पर दवाब डालने से भी पेट का मरोड़ ठीक होता हैं ।... इन पुराने तरीकों और जड़ी बूटियों की जानकारी पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह ख़त्म हो जाएंगी । आज जब अंग्रेज़ी दवाईयां बहुत महंगी हो रही हैं , उनसे होने वाले नुकसानों का भी पता चल रहा हैं ।... अब ज़रुरत हैं ऐसी चिकित्सा व्ययस्था की जिसमे सबका मिलाजुला रूप हो जो आम आदमी को आसानी से मिले सके जिसमे सभी नए पुराने तरीकों के फायदे हो । आगे पढ़िए..
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आबादी

by वीणा शिवपुरी
" कम करने कि दिशा में औरत का बेहतर दर्जा भी कारगर साबित होता हैं । जब तक ५० फी सदी लोगो कि यानि औरतो की कोई इज़्ज़त नहीं होती , बेटे की चाहत कम नहीं होगी । औरतो का अपने शरीर पर नियंत्रण नहीं हैं । उन्हें बच्चों की संख्या का फैसला लेने का हक़ नहीं हैं । ... हमे इस पर एतराज़ हैं हमे चाहिए ऐसी जनसंख्या नीतियां जो औरत के बुनियादी हको की रक्षा करते हुए उसके तन - मन और भावनाओ की इज़्ज़त की । " आगे पढ़िए ...

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About Living Feminisms

Living Feminisms is an attempt to share archives preserved by Jagori, a New Delhi-based feminist organisation from the eighties. It offers subjective accounts by our curators as well as access to publications, songs, pamphlets, posters, photographs, poems etc. Together, they reflect the diverse spectrum that is the autonomous Indian women’s movement, its struggles, solidarities and differences, laughter, anger, carefree moments, campaigns, love, loss, work and home.

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