”जागोरी ग्रामीण” की धरती, आकाश और उगता ”तारा”

कार्यकर्ता और जेंडर ट्रेनर

”जागोरी ग्रामीण” की धरती, आकाश और उगता ”तारा”

कहाँ से शुरू करूँ इस सफ़रनामे का इतिहास? हाँ यह ज़रूर है कि मेरी यात्रा अन्दर भी उतनी ही चली है जितनी बाहर। बाहर के संघर्ष व आन्तरिक द्वन्द-दोनों ने मुझे लगातार कुछ नवीन कृतिपूर्ण करने का साहस सौंपा है।


आज जब लौट कर पीछे देखती हूँ और साथ ही जो सामने नज़र आता है, उसका कोई नमूना, कोई कागज़ पर उतरा नक्शा नहीं है। पर आज एक अद्धभुत इमारतहै-एक ओर ईंट और पत्थरों की मज़बूत इमारत और दूसरी ओर इन्सानों के इन्सानी रिश्तों की। प्यार, सम्मान, आपसी क़द्र के मिट्टी गारे से बनी ये जो खूबसूरती है वो स्थायी व गतिशील दोनों है। पल-पल बदलती नयी छाँव व छतों का निर्माण करती।


आज यही है मेरे मन की छवि जिसे सब जागोरी-ग्रामीण और तारा के नाम से जानते हैं। जागोरी ग्रामीण 100 से ज़्यादा गाँवों में फैला, पसरा विविधता व सशक्तिकरण की नींव पर खड़ा काम और तारा ट्रेनिंग और रिट्रीट केन्द्र जो सीमित दायरे में बँधा हो कर भी असीमित है। पूरे विश्व से आने वाले अतिथियों को अपनी हरियाली में समेटता हुआ।


मैंने इन दोस्तों की जमात को परिवार का नाम नहीं दिया। मैं आज भी इन इन्सानी रिश्तों की घनी आबादी के गाँव का नाम ढूँढती रहती हूँ क्योंकि यह चेहरे यार भी हैं, मेरा ईश्क भी, गीत भी और मेरी अंतरंग आत्मा के निवासी। पर इनकी बात कुछ ठहर कर करूँगी।


अपने जीवन में नये आयामों की खोज मेरा अभियान रहा है। शुरूआती दौर में यह नहीं जाना की जाना कहाँ है। बस यह ज़रूर जानती रही की कहाँ नहीं जाना है। मेरे जीवन की नारीवादी राजनीति को गढ़ना खुद के तीखे अनुभवों की तल्खी से सीखा। क्योंकि परिवार तो पितृसत्तात्मक कसीदों के धागे काढ़ना ही सिखा पाता है, औरत होने की नितियों के पाठ ही रटा पाता है। मैं हमेशा सोचती रही कि अगर इस तरह की औरत होना, जो समाज और परिवार को स्वीकृत हो वो हमारा स्वाभाविक चरित्र है, तो इसे फिर इतना दोहराना क्योंकि पड़ता है और जो मन कहता था उसे सीखना क्यों पड़ता है? पर बात तो मैं अपने बनाये रिश्तों की कर रही थी और उससे बनी बगिया के फूलों की महक आप सबके सामने मेरी अंजुल में भर कर एक-एक को सुँघाने की।


इस काम की शुरूआत बहुत पहले हुई थी। 30 साल पहले 1983 में जागोरी की कल्पना हम सात साथियों की साँझी पहल कदमी थी जिसमें शामिल थे जोगी, शीबा, रूनू मंजरी, गौरी, कमला और मैं। नारीवादी आन्दोलन बड़े शहरों की सड़कों पर उतर आया था। मथुरा व रमीज़ा बी के सामुहिक बलात्कार के मुद्दों से फेमिनिज़्म के नये समुद्र से उभरी लहर ने नारीवादी राजनीति को जन्म दिया। छोटे-छोटे समूहों में बड़ी-बड़ी चर्चायें, बहस व एक्शन की तलाश का दौर। ज़मीनी जुड़ाव की जुस्तजू ज़ोर पकड़ने लगी।मैंने जागोरीकेक कोआॅडिनेटर की भूमिका करीब 12 साल निभाई। एक कमरे का छोटा सा आँगन नुमा दफ़्तर। सब चारों ओरज़मीन पर अपना कोना ढँूढ लेते थे। सभी सारा काम मिलजुल कर करते। किसी का भी एक मेज़ नहीं था। बस एक पुराना टाईपराईटर हिन्दी का। धीरे-धीरे मेरा सामान हटने लगा, घर सिमटता गया और किताबें और फ़ाईलें पसरने लगी। पर सच कहूँ घर और दफ़्तर के बीच में कोई सीमा नहीं थी। उन दिनों काम और घर दो अलग जीवन नहीं थे। दफ़तर नहीं वो औरतों का एक अड्डा नुमा गेस्ट हाऊस भी था। महिला आन्दोलन से जुड़ी औरतें और कुछ पुरूष मित्र इस आॅफिस नुमा घर में रहते जब भी वो बाहर से आते साथ खाना, बातचीत, लिखना-पढ़ना और कहीं भी जगह मिलती दरियाँ बिछा सो जाना। एक बिल्कुल मोबाईल स्पेस/जगह।


बहस बाज़ी, मुद्दों की चीड़ फाड़ हम दोस्तों के बीच लगातार चलती रहती। शाम के अड्डे दिन के काम से भी ज़्यादा कृतिपूर्ण रहते। कभी शीबा, कभी गौरी, कभी कमला तो कभी मेरे दफ़्तर नुमा घर में ही नये प्लान बनते-कमला गाने लिखती और हम सब मिलकर गाते, शीबा-जोगी के साथ नोटबुक की चित्रकारी बनती रहती, हम सब मिलकर कवितायें लिखतें, रूनू नाटकों की तैयारी के साथ दमलगा कर गाती और मारती और मंजरी नारे लगातीं, ऐसे पुरज़ोर कि हम सब जोश से भर जाते। रात के समय धरनों और विरोध प्रदर्शन के पोस्टर, पर्चियाँ और प्लाकार्डस बनाने का काम इसी छोटी सी बरसाती में लगातार चलता रहता। शारदा बहन एक बस्ती की सशक्त कार्यकर्ता-एक कोने में ज़मीन पर बैठकर अखबारों के लिये पत्र लिखती रहतीं-अनूठा सा दफ़्तर था- न टेबल, न कुर्सी, न कमप्यूटर, न प्रिंटर-हम जहाँ बैठते वही दफ़्तर बन जाता। सड़कों पर ज़्यादा और दफ़्तरों में कम काम होता। बहुत छोटी टोलियाँ होने के बावजूद हम बड़े-बड़े काम कर गुज़रते।


एक्शन इन्डिया, अंकुर व जागोरी के मिले जुले प्रयास ने ”सबला संघ”-शहर की ग़रीब बस्तियों में काम करने वाली, अगुवाही की ताकत ओढ़े औरतों का एक ज़मीनी समूह तैयार किया। तब दौर कुछ और था। संस्थाओं की पहचान से ज़्यादा सामुहिक पहचानों का ज़माना था। संस्थाकरण का दौर बहुत बाद में आया।


शुरूआती दौर में हमारे अपने परिवारिक अनुभव और उसके चारांे ओरबिखरी चुप्पी और साथ ही बन्धनों के सामाजिक शोर को औरत की नज़रों से देखने, समझने और कहकर बदलने का मानों एक नया जोश उमड़ पड़ा। पर सोचने और कहने का नारीवादी अन्दाज क्या हो, खास तौर से जब बात उन औरतों से करनी है जिन्हें सदियों से साक्षरता की पहुँच से व्यवस्थित रूप से वंचित रखा गया हो? इसी बहस से उभरे नारीवाद को गाँव की पगडंडियों तक ले जाने के ख्वाब ने जागोरी को 1983 में जन्म दिया। 80 के दशक में शहर की ग़रीब बस्तियों में सतत् जुड़ाव व गाँव की दूरियों तक जाना, दोनों ही काम जागोरी ने गम्भीर व पुरज़ोर कोशिश से आगे बढ़ाये। स्वयं सेवी संस्थायें जो पुरूष प्रधान सोच व पुरूष नेतृत्व के अन्र्तगत चल रही थीं वहाँ महिला कार्यकर्ताओं को नारीवादी सोच व समझ के क़रीब लाना एक खासी चुनौती थी क्योंकि कई संस्थायें पुरूष प्रधान ही नहीं, सामन्तवादी भी थीं।


जागोरी की मुख्य पहचान एक नारीवादी टेªनिंग संस्था के रूप में तेजी से उभरने लगी और आज तक बनी हुई है। शहरी व ग्रामीण औरतों के साथ उनके जीवन से जुड़कर अनेक प्रक्रियाओं के सहारे मन, समाज व राज्यसत्ता की परतों को नारीवादी नज़रिये से खोलना शुरू किया। यही हमारे लिये टेªनिंग का सिलसिला बन गया। व्यक्तिगत ही राजनैतिक है, इस सिद्धान्त ने हम औरतों की ज़िन्दगियों की सामान्य व विशेष पहचानों को पकड़ना सिखाया। हमारी अपनी टोली में बहुत ग़रीब व अमीर औरतों की मजबूरियों व सुविधाओं की पोटलियों की गाँठों को खोलने का दर्द हमने लगातार दिया व लिया, जिसने ज़मीनी काम और टेªनिंग दोनों को और मज़बूत किया।


जागोरी नारीवादी आन्दोलन का हिस्सा रही है और हम सभी इस तरह के संगठनों से जुड़कर उसमें अगुवाही करते रहे हैं। यह ज़ाहिर है कि नारीवादी आन्दोलन ने ”हमारी” और ”काम” की पहचान का निर्माण किया और हमने नारीवादी आन्दोलन का। दोनों ने लगातार एक दूसरे का निर्माण किया। मथुरा बलात्कार से भँवरी और फिर निर्भया तक का सफ़र हमारी साँझी दौड़ रही है - चाहे 1984 में सिक्खों के क़त्ल का मामला हो, भोपाल गैस काँड हो, साम्प्रादायिक दंगों व आंतक का सवाल हो, बाबरी मस्जिद को ढहाने से लेकर गुजरात याने के नर संहार के बाद की राजनिति हो, या बढ़ता वैश्वीकरण, विकास के नाम पर आर्थिक आंतकवाद हो- हर मुद्दे से जूझना नारीवादी आन्दोलन का अन्तरंग संघर्ष रहा है।


सवाल सिर्फ़ औरत व आदमी के रिश्तों का नहीं। समाज में निहित हर गै़र बराबरी, हिंसा और विनाश की राजनिति पर सवाल उठाना, उसका विरोध करना व सत्ता की चाल बाज़ियों को हाशिये पर खड़े लोगों के साथ समझना, यह सभी नारीवाद की परिभाषा का हिस्सा है। कोई भी मुद्दा नहीं जो हम औरतों का नहीं।


शुरू के सात साल मेरे घर से ही जागोरी का काम चला। सालों तक जागोरी दिल्ली के काम को एक कोआॅर्डिनेटर के रूप में आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी मैंने सँभाली। इन ज़िम्मेदारियों के दौर में संघर्षों के नये-नये आयामों से गुज़रते रहे हम सब।


मेरे लिये ग़रीब शहरी बस्तियों के काम की सीमायें कुछ अलग तरह की कसमसाहट लिये खड़ी होने लगीं। व्यक्तिगत स्तर पर भी कुछ अलग तरह से जीने की ख्वाहिश जड़ पकड़ने लगी। बड़े शहरों के बनावटी आवरण में दम घुटने सा लगा।


इसी दौरान एक और ख्वाब पसरने लगा मन पटल पर-एक नारीवादी स्पेस/जगह के निर्माण का। एक ऐसी जगह जो संघर्षों की थकान धो सके। खूबसूरती से अकेले साँस लेने की जगह, जहाँ हम नारीवादी ट्रेनिंग के साथ-साथ प्रकृति की छाँव में बैठ कुछ कृतिपूर्ण करने की फुर्सत को जी सकें।


एक और आभास भी मुझे गाँवों की ओर खींच रहा था -एक नारीवादी आन्दोलन की आलोचना के रूप में। बहु आयामी आन्दोलन होने के बावजूद कहीं हमसे जमीन से जुड़कर जीने व काम करने का सफ़र दूर छूट गया। हम नारीवादियों ने विकास की मुख्यधारा की बहुत मज़बूत आलोचना तो हमेशा सामने रखी पर एक वैकल्पिक अवधारणा की ज़मीनी तस्वीर नहीं खींची। यही तलाश मुझे हिमाचल के ग्रामीण अँचल तक खींच लाई।


जागोरी ग्रामीण की स्थापना 2003 मे हुई। खास उद्देश्य था। ग्रामीण स्तर पर महिला सशक्तिकरण की प्रक्रियाओं को मज़बूत करना, युवा लड़कियों को नारीवादी एक्टिविस्ट (कर्मी) के रूप में तैयार करते हुये उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना, किसान महिला व पुरूषों के समूहों के साथ जैविक खेती व प्रकृति की संरचना व समृद्धि के विचार और अभ्यास को व्यापक स्तर पर स्थापित करना।


आज इस पूरे काम के असली कलाकार जागोरी-ग्रामीण की करीब 40 लोगों की बहुत मज़बूत, निष्ठावान टीम है। लगभग सभी जिन्होंने अपनी जीवन कथायें लिखी हंै इन्हीं गाँवों से उभरे हैं और गाँवों के ग़रीब व सीमान्ती समूहों के जीवन से पूरी तरह परिचित। इसी समाज के होकर भी वे इस समाज की बदली, नई आवाज़ हैं- जेन्डर, जाति, वर्ग व अन्य सभी भेदभावों के खिलाफ़ उठ खड़ी एक बुलन्द इन्सानी पहल कदमी।


इस मज़बूत टीम में औरत और मर्द दोनों हैं पर बहुत ही सुन्दर रिश्तों के साथ। कई बार सोचती हूँ कि एक बार पुरूष नारीवादी बन जाये तो उनसे बात करना उनके अपने अहसासों को सुनना-समझना कितना आसान हो जाता है। और किस तरह धीरे-धीरे वे संजीदा इन्सान बन जाते हैं। उनके पारिवारिक रिश्ते भी नया रूप लेते हैं। औरतों के दुखों के प्रति उनकी संजीदगी परिवार के अन्दर व बाहर सभी को छूती है।

औरतों के सम्मान के हक पर प्रश्न उठाना धीरे-धीरे हक़ों के स्थापित करने में तब्दील हो जाता है। कुछ पुरूष साथियों को दरअसल अपने घर में पत्नियों, बहनों, माँओं के विचारों को बदलने में भी परेशानी होती है। एक नई चुनौती है जब वे कहते हैं ”मैं तो समझ गया पर आप मेरी पत्नी को समझा दीजिये”। अभी तक सिर्फ़ औरतें ये कहती थी की हम तो समझ गये आप हमारे पतियों को समझा दीजिये। हमारी नहीं सुनते।

जहाँ तक टीम की जवान औरतों की ज़िन्दगियों का सवाल है, वहाँ किसी हद तक वे अपनी ज़िन्दगियों को अपने हाथों में लेने में सक्षम हुई हैं और वो सब उन्होंने अपनी जीवनियों में बखूबी दर्शाया है। पर स्वयं को बदलने की यात्रा कभी खत्म नहीं होती और हर वक्त कुछ नये द्वन्द और विरोधाभास सामने आते रहते हैं। ख़ास मुद्दा ‘शादी‘ की संस्था व शादी करने या न करने के निर्णयों से भी जुड़ा है। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि आज वे अपने परिवार के आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक मुद्दों पर निर्णायक भूमिका निभाती हैं। उनकी अपनी माँओं से दोस्तियाँ बनी हैं और साथ ही वे अपने पिताओं, भाईयों को इस नई सोच के साथ समझाने समझने में सक्षम हुई हैं। साथ ही आज क़रीब-क़रीब सभी ने अपने शैक्षिणिक स्तर को लगातार आगे बढ़ाया है। शायद ही टीम में कोई ऐसे हैं जो आगे पढ़ाई नहीं कर रहे।


आज जागोरी ग्रामीण की अपनी एक सशक्त पहचान है। पंचायत और पुलिस दोनों महिला हिंसा के मामले जागोरी की नारी अदालत मे करते हैं यह कहकर कि वहाँ आपको सच्चा न्याय मिलेगा। आज हमारी तीन नारी अदालतें, दो हीलिंग केन्द्र व दो युवा ज्ञान व जानकारी व कृति केन्द्र हैं। ये सभी लोक आधारित संस्थाओं के रूप में चलाई जाती हैं-जिसमें जागोरी टीम और ग्रामीण नेतृत्व दोनों की सहभागिता रहती है।
आज जागोरी ग्रामीण की टीम ने काम को गाँवों में ही नहीं,स्कूल, काॅलेज, पंचायतों, कचहरियों, पुलिस थाने जैसी संस्थाओं तक पहुँचाने में अगुवाही की है व जहाँ अलग-अलग तरह से टेªनिंग, वर्कशाप, रात्रि मीटिंग के माध्यम से जेन्डर आधारित न्याय व अधिकारों की समझ व उसको अपने जीवन व काम में उतारने की प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया है।


जहाँ तक इस कार्यक्रम को नेतृत्व देने का सवाल है, मैं एक सलाहकार के रूप में रोज़मर्रा के काम को दिशा देने की ज़िम्मेदारी उठाती हूँ। कमला गीत, कविता, पोस्टर व ट्रेनिंग जैसी कृतिपूर्ण गतिविधियों के अलावा जन सम्पर्क को मज़बूत बनाकर सन्साधन जुटाने के काम की ज़िम्मेदारी निभाती है और अनूप ने पूरी टीम को जुड़ाव करने के साथ-साथ फ़ाईनेन्स व व्यवस्थाओं को चलाने का काम अपने हाथ में ले रखा है। हम एक तरह से एक दूसरे के पूरक हैं पर यह तभी सम्भव है जब जागोरी ग्रामीण जैसी टीम साथ में हो।


दो विशेष चुनौतियाँ हैं एक तो कि जागोरी ग्रामीण की अवधारणा व अभ्यास को समुदाय के हाथ में सौंपने की प्रक्रियाओं को कैसे लागू किया जाये ताकि यह काम ग्रामीण समुदाय के नेतृत्व से आगे बढ़े। दूसरी चुनौती जिसका शायद हम जैसी सभी संस्थायें सामना करती हैं, वो हैं दूसरे स्तर के नेतृत्व के निर्माण की। मैं, कमला और अनूप किसी हद तक इस कार्यक्रम की अवधारणा को ज़मीन पर उतारने का काम करते रहे हैं। मैं खास तौर से लगातार ऐसे व्यक्ति की तलाश में हूँ जो इस टीम की निष्ठा बनाये रखते हुये जागोरी ग्रामीण के प्राण व स्पन्दन को जीवित रखने का काम आगे बढ़ायेगी। यह हमारी ज़रूरत व ख्वाब दोनों है।

तारा- ट्रेनिंग एण्ड रिसर्च अकेडमी


तारा एक नारीवादी ट्रेनिंग व रिसर्च अकेडमी है जो तारा के नाम से जानी जाती है। जहाँ जागोरी ग्रामीण का काम 10 साल के अनुभवों पर खड़ा है, वहाँ दूसरी ओर एक और टीम है जिसे सभी तारा टीम के नाम से जानते हैं। तारा एक महिला केन्द्रित ट्रेनिंग व रिट्रीट सेन्टर है। इस तरह की एक जगह - स्पेस बनाने का सपना मैं और कमला दोनों कई समय से देख रहे थे। जागोरी ने एक ज़मीन भी दिल्ली शहर के पास ले ली थी। पर मैं अपने आप में स्पष्ट थी कि इस तरह की एक जगह गाँवों के आसपास ही होनी चाहिये, प्रकृति के क़रीब जहाँ जीवन अलग तरह से नारीवादी सिद्धान्तों पर जिया जा सके। एक ऐसी जगह जहाँ सूकून और आन्तरिक धड़कनों को सुनना सम्भव हो, प्रकृति से द्वन्द न हो और सभी जीवित प्राणी पेड़-पौधे, पक्षी, पहाड़ व नदियाँ एक कोओपरेटिव बनकर एक दूसरे को सुने और समझें व समझायें।


हिमाचल, हरियाणा व पंजाब में नारीवादी आन्दोलन का मजबूत न होना, लड़कियों की सँख्या में लगातार गिरावट और महिला हिंसा की वारदातें और साथ ही खेती की ज़मीनों पर ज़हरीली खाद व कीटनाशकों की मार ही हमें यहाँ खींच लाई। औरत व ज़मीन के शोषण के पहलुओं में जो समानता है उसे गहराई से समझ कर दोनों की मुक्ति के लिये प्रयास करना मेरे लिये एक रूहानी सफ़र है। जागोरी ग्रामीण व तारा उसी यात्रा के पड़ाव हैं।


तारा की 18 लोगों की टीम अपने आप में बहुत सक्षम, समर्थ, मेहनती और साथ ही संवेदनशील औरतों व आदमियों का समूह है। सभी ने ढेर सारा काम व उसके नये तरीक़े सीखने में खुद को लगातार माहिर बनाया है। वे तारा में आये अतिथियों को तारा में अपने घर आने का एहसास देते हैं। यहाँ गाँव के महिला, पुरूष, युवा लड़के व लड़कियाँ, स्वयं सेवी संस्थाओं के कर्मी, अन्तर्राष्ट्रीय अमीर वर्ग के मेहमान सभी के साथ उनका व्यवहार एक सा होता है। साथ ही एक छोटा सुन्दर जैविक खेती के सिन्द्धातों पर बनाया खेत है जहाँ अलग-अलग जैविक सब्ज़ियाँ, फल व अनाज उगाकर एक प्रयास को स्थापित करने की पुरज़ोर कोशिश है।


तारा टीम एक दूसरे का पूरक बन कर काम करती है। कौन कब किसका काम सम्भालता है कभी पता नहीं लगता। साथ ही उन्होंने एक नारीवादी एस्थेटिक यानि सृजनात्मकता को भी अपने जीवन में उतारा है। उनका सदा मुस्कुराना, एक दूसरे के सुख दुख को अपना मान उसमें शामिल होना और मेहमानों के कहने से पहले उनकी ज़रूरतों को समझ लेना, इस तारा टीम की ख़ास पहचान है।


इस तरह ये दोनों समूह करीब 60 लोगों की महफिल है अपना खास वज़ूद लिये और दोनों एक दूसरे से अलग होते हुये भी साथ हैं और एक दूसरे के पूरक हैं।


ये नारीवादी ख्वाब अपने सतरँगी रगों में इन सारी जीवनियों की धरती, आकाश से उगता तारा है।