• ६३ साल की शान्ति  स्वायत्य नारी आन्दोलन के साथ अपने इस लम्बे अरसे से जुड़े रिश्ते और अलग अलग दौर के अनुभवों की याद को ताज़ा और सबके साथ बांटने के लिए कुछ तस्वीरें सांझा कर रही हैं I ये तमाम तस्वीरें उनके भरपूर जीवन-यात्रा की,... इनमे बसी है अपनी पृष्ठभूमी, खट्टी मीठी तीखी यादों को लिए है, यादें उन लम्हों की... ठहाकों की,... उधेड़ बुन की... उलझनों की... फैसलों की... हार की... जीत की... तकरार की... प्यार की...

  • अभिलेखों को इतना रोचक बना देने वाली चीज़ों में.… मुद्दों का उद्भव और उनका एक बहस का रूप ले लेना और ख़ास तौर से व्यक्तियों की लम्बी यकृ भी शामिल हैं जो उनकी रीढ़ और आत्मा है। सालों बाद फिर से अपने सवालों के जवाब में क्रांति और सबला ने अपने धार्मिक घर भी त्याग दिए। अंततः उन्हें जो मिला उसने उनके मानदंड और उनके नाम ही बदलकर रख दिए। 

  • एक-आयामी, गंभीर और  विरोधी! अगर नारीवाद और नारीवादी काम को इसी तरह सबके सामने पेश किया जाता है तो सरोजिनी का लेख इस मिथक तो झूठा साबित कर सकता है। परंपरागत उपचार से धर्मनिरपेक्षता तक, सामूहिक बाल देखभाल को एक कलात्मक रूप देने वाली, सरोजिनी अपनी समृद्ध और परिपूर्ण यात्रा के इन्द्रधनुष को उजागर करती है।  

  • अस्सी के दशक के मध्य के फोटोग्राफ कमला भसीन की यादों को जोश प्रदान करते हैं। उनका लेखन 'काम-जीवन के संतुलन' को दर्शाते हुए यह बताता है की इन दोनों ध्रुवों को कैसे अपनी-अपनी जगह पर कायम रहना चाहिए। कमला अपने लेखन के माध्यम से नारीवादी ज़िन्दगियों में, जहाँ पर काम एक मज़ा है और जीवन ही काम है, ऐसे जैविक अतिक्रमणों का जश्न मानती हुई प्रतीत होती हैं। उनके लिए व्यक्तिगत ही राजनैतिक है और राजनैतिक ही व्यक्तिगत। 

लिविंग फेमिनिज़म्स नई दिल्ली स्थित नारीवादी संगठन जागोरी द्वारा चलाया जा रहा एक डिजिटल अभिलेखागार है। यह अभिलेखागार जागोरी के प्रारंभिक और ताजा अतीत तथा इसे जन्म देने वाले स्वायत्त भारतीय महिला आंदोलन के तीन दशकों की नारीवादी सामग्री तक मुक्त और सार्वजनिक पहुंच उपलब्ध करा रहा है।